स्वस्ति वाचन मंत्र हिंदी अर्थ सहित
क्या आप जानते हैं कि हर शुभ कार्य से पहले पंडित जी "स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः" क्यों पढ़ते हैं? "स्वस्ति" का अर्थ है कल्याण और मंगल। स्वस्ति वाचन वह वैदिक प्रार्थना है जिसमें हम देवताओं से शुभ विचार, स्वास्थ्य, दीर्घायु और शांति माँगते हैं।
यह पाठ ऋग्वेद के भद्र सूक्त और शुक्ल यजुर्वेद के शांति मंत्रों से बना है। आइये इसके 12 प्रमुख संपूर्ण स्वस्ति वैदिक मंत्र सरल हिंदी संक्षिप्त अर्थ के साथ समझें।
॥ स्वस्ति-वाचन मंत्र॥
1. आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासो अपरीतास उद्भिदः।
देवाना यथा सदमिद्वृधे असन्नप्रायुवो रक्षितारो दिवे-दिवे
हर दिशा से शुभ विचार हमारे पास आएँ।
2. देवानां भद्रा सुमतिरृजूयतां देवानां रातिरभि नो नि वर्तताम्।
देवानां सख्यमुप सेदिमा वयं देवा न आयुः प्र तिरन्तु जीवसे॥
देवताओं की कल्याणकारी बुद्धि,
सरल मार्ग पर चलने वालों को मिले।
3. तान् पूर्वया निविदा हूमहे वयं भगं मित्रमदिति दक्ष मस्त्रिधम्।
अर्यमणं वरुणँ सोममश्विना सरस्वती नः सुभगा मयस्करत्॥
प्राचीन वैदिक वाणी से
हम भग, मित्र, अदिति आदि देवताओं को बुलाते हैं।
4. तन्नो वातो मयोभु वातु भेषजं तन्माता पृथिवी तत्पिता द्यौः।
तद्ग्रावाणः सोमसुतो मयोभुवस्तदश्विना शृणुतं धिष्ण्या युवम्॥
वायु, पृथ्वी और आकाश
हमें सुख देने वाली औषधि और स्वास्थ्य दें।
5. तमीशानं जगतस्तस्थुषस्पतिं धियंजिन्वमवसे हूमहे वयम्।
पूषा नो यथा वेदसामसद्वृधे रक्षिता पायुरदब्धः स्वस्तये॥
जगत के स्वामी से
रक्षा और बुद्धि-समृद्धि की प्रार्थना।
6. स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः।
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥
यशस्वी इंद्र, ज्ञानी पूषा, गरुड़ (तार्क्ष्य) और बृहस्पति
हमारा कल्याण करें।
7. पृषदश्वा मरुतः पृश्निमातरः शुभंयावानो विदथेषु जग्मयः।
अग्निजिह्वा मनवः सूरचक्षसो विश्वे नो देवा अवसा गमन्निह॥
मरुद्गण शुभ फल दें और यज्ञ में सहायक हों।
8. भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।
स्थिरैरंगैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः॥
हम कानों से शुभ सुनें,
आँखों से शुभ देखें और
स्वस्थ शरीर से स्तुति करें।
9. शतमिन्नु शरदो अन्ति देवा यत्रा नश्चक्रा जरसं तनूनाम्।
पुत्रासो यत्र पितरो भवन्ति मा नो मध्या रीरिषतायुर्गन्तोः॥
हमें सौ वर्ष की आयु मिले और वह बीच में न टूटे।
10. अदितिर्द्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्रः।
विश्वे देवा अदितिः पंच जना अदितिर्जातमदितिर्जनित्वम्॥
अदिति ही आकाश, अंतरिक्ष, माता, पिता और पुत्र हैं,
यानी पूरी सृष्टि का स्वरूप।
11. द्यौः शान्तिरन्तरिक्षं शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः।
वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे देवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्वं शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि॥
आकाश, पृथ्वी, जल, औषधि और वनस्पति,
सब जगह शांति हो।
12. यतो-यत: समीहसे ततो नो अभयं कुरु।
शं न: कुरु प्रजाभ्योऽभयं न: पशुभ्य:॥
चारों दिशाओं से भय दूर हो,
परिवार, समाज और पशुधन सब सुरक्षित और सुखी रहें।
(ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः)