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कैंची धाम जाना है? जानिए कैसे पहुंचें और क्यों कहते हैं इसे नीब करौरी बाबा का चमत्कारी धाम

कैंची धाम जाना है? जानिए कैसे पहुंचें और क्यों कहते हैं इसे नीब करौरी बाबा का चमत्कारी धाम

संक्षिप्त सार (Summary)

उत्तराखंड के नैनीताल जिले में क्षिप्रा नदी के किनारे बसा कैंची धाम, नीब करौरी बाबा (नीम करोली बाबा) का पावन धाम है। भक्त उन्हें हनुमान जी का अंश मानते हैं। इस लेख में जानिए कैंची धाम ट्रेन, बस, सड़क और हवाई मार्ग से कैसे पहुंचें और बाबा के चमत्कारों की कथाएँ, कैंची नाम का रहस्य, उनका जीवन परिचय और दर्शन से पहले ज़रूरी बातें।

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कैंची धाम जहाँ पहाड़ों की शांति में बसते हैं नीब करौरी बाबा महाराज

देवभूमि उत्तराखंड की गोद में, क्षिप्रा नदी के किनारे और पहाड़ों की शांत वादियों के बीच बसा है । यहाँ पहुँचते ही मन अपने आप शांत हो जाता है। यह वही पावन धाम है जहाँ नीब करौरी बाबा ने अपने जीवन का अंतिम दशक बिताया। भक्त प्रेम से उन्हें "महाराज जी" कहते हैं और हनुमान जी का अंश मानते हैं। अगर आपके मन में भी कैंची धाम की यात्रा का भाव जागा है, तो माना जाता है कि यह बुलावा बाबा का ही है। आइए जानें कैंची धाम कैसे पहुंचें और क्यों इसे चमत्कारी धाम कहा जाता है।

क्यों कहते हैं इसे नीब करौरी बाबा का चमत्कारी धाम?

भक्तों का अटल विश्वास है कि महाराज जी साधारण संत नहीं थे। उनकी विनम्रता, निर्भय भक्ति और निस्वार्थ सेवा में भक्तों को हनुमान जी का ही स्वरूप दिखता है। इसी श्रद्धा से कैंची धाम को चमत्कारी धाम कहा जाता है। नीचे की कथाएँ भक्तों के अनुभवों और लोककथाओं से ली गई हैं। ये आस्था की बातें हैं, इन्हें ऐतिहासिक प्रमाण के रूप में नहीं रखा गया है।

1. बिना टिकट सफ़र और नीब करौरी की कथा

कहा जाता है कि बाबा एक बार बिना टिकट रेल के प्रथम श्रेणी डिब्बे में बैठ गए। टिकट निरीक्षक ने फर्रुखाबाद जिले के नीब करौरी गाँव के पास गाड़ी रुकवाकर उन्हें उतार दिया। इसके बाद इंजन आगे बढ़ा ही नहीं। जब अधिकारियों ने क्षमा माँगकर आदर से बाबा को बैठाया, तभी गाड़ी चली। इसी कथा के साथ नीब करौरी बाबा नाम जुड़ा माना जाता है।

2. अंतर्यामी दृष्टि

भक्त बताते हैं कि बाबा बिना बताए ही मन की बात और घर की चिंता जान लेते थे। उनके पश्चिमी शिष्य रामदास ने इन अनुभवों को अपनी पुस्तक Miracle of Love में संजोया है।

3. भंडारे में प्रसाद कभी कम नहीं पड़ता

मान्यता है कि महाराज जी के नाम के भंडारे में भीड़ कितनी भी हो, मालपुआ और पूरी-आलू का प्रसाद कम नहीं पड़ता। बाबा कहते थे कि भूखे को भोजन कराना सबसे बड़ी पूजा है।

4. "मेरे नहीं, हनुमान जी के चरण छुओ"

कोई चरण छूता तो बाबा सारी महिमा हनुमान जी और राम नाम को सौंप देते थे। यही भाव उन्हें हनुमान जी का परम भक्त बनाता है, और भक्तों की नज़र में उनका अंश भी।

कैंची नाम का रहस्य

यहाँ सड़क पर दो बहुत तीखे हेयरपिन मोड़ हैं, जिन्हें स्थानीय भाषा में "कैंची" कहा जाता है। इन्हीं मोड़ों के पास धाम बसा, इसलिए नाम पड़ा कैंची धाम। हनुमान जी के मंदिर की प्रतिष्ठा 15 जून 1964 को हुई थी। इसीलिए हर वर्ष 15 जून को स्थापना दिवस पर मेला और भंडारा होता है।

दुनिया भर के लोग क्यों खिंचे आते हैं?

यहाँ आने वालों में एप्पल के संस्थापक स्टीव जॉब्स, मार्क ज़ुकरबर्ग और विराट कोहली-अनुष्का शर्मा के नाम भी लिए जाते हैं। हाल ही में बाबा के जीवन पर बनी फिल्म हनुमान अंश के बाद धाम की चर्चा और बढ़ी है, और रिपोर्टों के अनुसार दर्शन के लिए आने वालों की संख्या में भारी उछाल आया है।

नीब करौरी बाबा का जीवन परिचय

जन्म: लगभग 1900 में उत्तर प्रदेश के अकबरपुर (फिरोजाबाद) में, संपन्न ब्राह्मण परिवार में। बचपन का नाम लक्ष्मी नारायण शर्मा बताया जाता है।

विवाह: 11 वर्ष की आयु में रामबेटी जी से।

तपस्या: लगभग 1911 में घर छोड़कर बाबा लक्ष्मण दास के रूप में साधना की। बाद में पिता के आग्रह पर लौटकर गृहस्थ जीवन भी निभाया।

कैंची धाम की स्थापना: 15 जून 1964 को हनुमान मंदिर की प्रतिष्ठा हुई।

पश्चिमी शिष्य: 1967 के आसपास अमेरिका से रिचर्ड एल्पर्ट आए, जो आगे चलकर रामदास कहलाए।

महासमाधि: 11 सितंबर 1973 को वृंदावन में। माना जाता है कि उनके अंतिम शब्द "जय जगदीश हरे" थे। वृंदावन के आश्रम में उनकी समाधि है।

जीवन में कुछ तिथियों पर स्रोतों में थोड़ा अंतर मिलता है, इसलिए जन्म का वर्ष "लगभग" लिखा गया है।

कैंची धाम कैसे पहुंचें?

आप देश के किसी भी शहर से आएँ, आखिरी पड़ाव लगभग एक ही रहता है। पहले काठगोदाम या हल्द्वानी पहुँचें, फिर भवाली होते हुए कैंची धाम। भवाली से धाम लगभग 9 किमी और नैनीताल से लगभग 17 किमी दूर है।

ट्रेन से: निकटतम बड़ा रेलवे स्टेशन काठगोदाम है, जहाँ से धाम लगभग 40 किमी दूर है। स्टेशन से टैक्सी या बस लेकर लगभग एक घंटे में पहुँचा जा सकता है। दिल्ली, बरेली और आसपास के कई शहरों से काठगोदाम के लिए ट्रेनें मिलती हैं। यात्रा से पहले IRCTC पर अपने शहर की ट्रेन देख लें।

बस से: दिल्ली, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कई शहरों से हल्द्वानी, काठगोदाम और नैनीताल के लिए बसें चलती हैं। वहाँ से भवाली की बस या शेयरिंग टैक्सी लेकर कैंची धाम पहुँचें।

अपनी गाड़ी या कैब से: दिल्ली से रास्ता हापुड़, मुरादाबाद, रामपुर, हल्द्वानी, काठगोदाम और भवाली होते हुए जाता है, जो लगभग 300-320 किमी है। सुबह जल्दी निकलना अच्छा रहता है और पहाड़ी मोड़ों पर रात में गाड़ी चलाने से बचना चाहिए।

हवाई मार्ग से: सबसे नज़दीकी हवाई अड्डा पंतनगर है, जो लगभग 70-79 किमी दूर है। वहाँ से टैक्सी से धाम पहुँचा जा सकता है।

दर्शन से पहले ज़रूरी बातें

भीड़ का ध्यान रखें: फिल्म "हनुमान अंश" के बाद सप्ताहांत में बहुत भीड़ रहती है। हो सके तो सप्ताह के बीच के दिन चुनें। प्रशासन भीड़ प्रबंधन के लिए रजिस्ट्रेशन जैसे उपायों पर विचार कर रहा है, इसलिए जाने से पहले ताज़ा नियम देख लें।

15 जून के मेले में निजी वाहनों पर रोक लग सकती है। ऐसे में तय पार्किंग में गाड़ी खड़ी करके शटल से जाना पड़ता है।

समय: सामान्यतः सुबह से शाम तक दर्शन होते हैं। सुबह और शाम को आरती होती है। मौसम और प्रशासन के अनुसार समय बदल सकता है।

मर्यादा: परिसर में फोटो और रील बनाना मना है। सादे वस्त्र पहनें, शांति रखें और प्रसाद को आदर से ग्रहण करें।

ठहरना: सप्ताहांत और मेले में नैनीताल, भवाली या भीमताल में पहले से कमरा बुक कर लें।

पहनावा: सर्दियों में गर्म कपड़े ज़रूर रखें, क्योंकि पहाड़ों में शाम जल्दी ठंडी हो जाती है।


कैंची धाम सिर्फ़ एक यात्रा का पड़ाव नहीं है, यह भक्ति, शांति और विश्वास का संगम है। यहाँ पहाड़ों की ठंडी हवा में हनुमान जी की आरती की गूँज और घंटियों की मधुर ध्वनि मन के सारे बोझ हल्के कर देती है। यहाँ आकर कोई राजा नहीं रहता और कोई रंक नहीं, सब महाराज जी के चरणों में बस एक भक्त होकर बैठते हैं।

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क्या आप ये जानते है (FAQ)

ट्रेन से काठगोदाम उतरकर लगभग 40 किमी टैक्सी या बस से, या बस और अपनी गाड़ी से हल्द्वानी और भवाली होते हुए। हवाई मार्ग के लिए पंतनगर हवाई अड्डा सबसे नज़दीक है।

काठगोदाम। वहाँ से धाम की दूरी लगभग 40 किमी है और पहुँचने में करीब एक घंटा लगता है।

भक्तोंहर वर्ष 15 जून को स्थापना दिवस पर भंडारा और मेला लगता है।

उनका जन्म नाम लक्ष्मी नारायण शर्मा बताया जाता है। गृहत्याग के बाद वे बाबा लक्ष्मण दास कहलाए और आगे चलकर नीब करौरी बाबा, नीम करोली बाबा या महाराज जी के नाम से प्रसिद्ध हुए।

फरवरी से जून और सितंबर से नवंबर का मौसम सुहावना रहता है। भीड़ से बचना हो तो 15 जून के आसपास और सप्ताहांत से बचें।

वृंदावन (मथुरा, उत्तर प्रदेश) के आश्रम में। 11 सितंबर 1973 को उन्होंने वहीं महासमाधि ली।