हिन्दू पंचांग में हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को शिवरात्रि के रूप में मनाया जाता है, जिसे मासिक शिवरात्रि कहा जाता है। भगवान शिव को मानने वाले भक्त इस दिन व्रत रखकर पूरी श्रद्धा से शिवलिंग की पूजा करते हैं। पूरे साल में ऐसी बारह शिवरात्रि आती हैं।
सावन शिवरात्रि का महत्व
जब यह तिथि श्रावण महीने में पड़ती है, तो इसे सावन शिवरात्रि या श्रावण शिवरात्रि कहा जाता है। भगवान शिव की आराधना के लिए वैसे भी पूरा सावन महीना बहुत खास माना जाता है, इसलिए इस महीने की शिवरात्रि का महत्व और भी बढ़ जाता है। बात करें सबसे बड़ी शिवरात्रि की, तो वह है महाशिवरात्रि — जो उत्तर भारतीय पंचांग के अनुसार फाल्गुन महीने में और अंग्रेज़ी कैलेंडर के हिसाब से फरवरी-मार्च के आसपास आती है।
मंदिरों में विशेष आयोजन
काशी विश्वनाथ और बद्रीनाथ धाम जैसे प्रसिद्ध शिव मंदिरों में सावन के महीने में खास पूजा-अर्चना और दर्शन का आयोजन किया जाता है। इस दौरान लाखों शिवभक्त इन मंदिरों में पहुंचकर गंगाजल से शिवलिंग का अभिषेक करते हैं और भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
अलग-अलग राज्यों में अलग नाम
जिन राज्यों में पूर्णिमा आधार पंचांग चलता है — जैसे उत्तराखण्ड, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़ और झारखण्ड — वहां सावन शिवरात्रि को खूब मनाया जाता है। वहीं जिन राज्यों में अमावस्या (अमांत) आधार पंचांग का पालन होता है, जैसे आन्ध्र प्रदेश, तेलंगाना, गोवा, महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात और तमिलनाडु — वहां इसी तिथि को आषाढ़ शिवरात्रि के नाम से जाना जाता है।
व्रत रखने की विधि
शिवरात्रि से एक दिन पहले यानी त्रयोदशी को भक्तों को दिन में सिर्फ एक बार भोजन करना चाहिए। शिवरात्रि के दिन सुबह नित्य कार्यों के बाद व्रत का संकल्प लिया जाता है — मन ही मन अपनी प्रतिज्ञा दोहराते हुए भगवान शिव से व्रत निर्विघ्न पूरा होने की प्रार्थना की जाती है। चूंकि हिन्दू धर्म में व्रत रखना आसान नहीं होता, इसलिए भक्तों को श्रद्धा और विश्वास के साथ इसे पूरा करने का संकल्प लेना चाहिए।
शाम को स्नान करने के बाद ही पूजा या मंदिर-दर्शन करना उचित माना गया है।
भगवान शिव की आरती तथा पूजा रात के समय की जाती है और अगले दिन स्नान के बाद व्रत खोला जाता है। व्रत का पूरा फल पाने के लिए इसे सूर्योदय और चतुर्दशी तिथि खत्म होने के बीच ही समाप्त करना चाहिए — हालांकि कुछ मान्यताओं के अनुसार व्रत चतुर्दशी तिथि खत्म होने के बाद तोड़ना सही है। इन दो विचारों में मतभेद ज़रूर है, लेकिन आमतौर पर यही माना जाता है कि शिव-पूजा और व्रत का पारण, दोनों चतुर्दशी तिथि खत्म होने से पहले ही कर लेने चाहिए।