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रक्षा बंधन पूजा | Raksha Bandhan Rakhi Tying Muhurat

Raksha Bandhan

संक्षिप्त सार (Summary)

रक्षाबंधन भाई-बहन के प्रेम, रक्षा और विश्वास का पर्व है। यह श्रावण पूर्णिमा को मनाया जाता है और इसकी जड़ें पौराणिक कथाओं में गहराई से जुड़ी हैं। आइए जानते हैं इस पर्व का महत्व, कथाएं और पूजा विधि विस्तार से।

रक्षा बंधन पूजा | Raksha Bandhan Rakhi Tying Muhurat

इस वर्ष रक्षाबंधन
शनिवार, 18 अगस्त 2035 शनिवार, श्रावण-शुक्ल-प्रतिपदा, २०३५
पूजा करने का शुभ मुहूर्त
Rakhi Tying: 1:43 PM – 4:20 PM दोपहर: १:४३ PM - ४:२० PM
राहुकाल
9:08 AM – 10:46 AM
* यहाँ सभी समय नई दिल्ली स्थान आधारित है
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राखी का धागा सिर्फ कलाई पर बंधा एक धागा नहीं, बल्कि भाई-बहन के रिश्ते में बसी रक्षा, स्नेह और विश्वास की डोर है। हर साल श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला यह त्यौहार भारतीय संस्कृति की उस मिठास को दर्शाता है, जो सदियों से हमारी परंपराओं में रची-बसी है।


रक्षाबंधन का पौराणिक और धार्मिक महत्व

रक्षाबंधन का इतिहास बहुत पुराना है और इसकी जड़ें हमारे शास्त्रों और पुराणों में गहराई तक जुड़ी हैं। कहा जाता है कि जब राक्षसों और देवताओं के बीच युद्ध छिड़ा था, तब इंद्राणी ने अपने पति इंद्र देव की कलाई पर एक रक्षा सूत्र बांधा था, जिससे उन्हें युद्ध में विजय प्राप्त हुई। यही रक्षा सूत्र आगे चलकर रक्षाबंधन के रूप में प्रचलित हुआ।

एक और प्रसिद्ध कथा महाभारत से जुड़ी है, जब द्रौपदी ने भगवान श्रीकृष्ण की उंगली से बहते खून को रोकने के लिए अपनी साड़ी का एक टुकड़ा फाड़कर बांध दिया था। इस स्नेहमयी भाव से प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण ने द्रौपदी की रक्षा का वचन दिया, जिसे उन्होंने चीरहरण के समय निभाया भी। यही कारण है कि रक्षाबंधन केवल रक्त संबंधों तक सीमित नहीं, बल्कि यह विश्वास और वचन का प्रतीक भी है।

यम और यमुना की कथा भी इस पर्व से जुड़ी है, जहां यमुना ने अपने भाई यमराज को राखी बांधी और यमराज ने उन्हें अमरता का वरदान दिया। इसी वजह से कहा जाता है कि जो भाई बहन के हाथों राखी बंधवाकर वचन निभाता है, उसकी आयु लंबी होती है।


शुभ मुहूर्त का महत्व

राखी बांधने के लिए शुभ मुहूर्त का विशेष ध्यान रखा जाता है, क्योंकि भद्रा काल में राखी बांधना वर्जित माना गया है। पंचांग के अनुसार पूर्णिमा तिथि और भद्रा रहित समय देखकर ही परिवारों में राखी बांधने का शुभ समय तय किया जाता है। इस दिन बहनें सुबह स्नान कर पूजा की थाली सजाती हैं, जिसमें रोली, चावल, दीपक, मिठाई और राखी रखी जाती है।


पूजा विधि और परंपरा

रक्षाबंधन की पूजा विधि सरल पर अत्यंत भावपूर्ण होती है। सबसे पहले भाई को आसन पर बिठाया जाता है, फिर बहन उसके माथे पर तिलक लगाकर आरती उतारती है। इसके बाद दाहिने हाथ की कलाई पर राखी बांधी जाती है और मुंह मीठा कराया जाता है। भाई अपनी बहन की रक्षा का वचन देता है और यथाशक्ति उपहार देता है। कई घरों में इस दिन भगवान गणेश और मां लक्ष्मी की पूजा भी की जाती है, ताकि परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहे।


रक्षा सूत्र का आध्यात्मिक अर्थ

शास्त्रों में रक्षा सूत्र को केवल एक धागा नहीं, बल्कि एक दिव्य कवच माना गया है। यह मान्यता है कि जब यह पवित्र सूत्र श्रद्धा और मंत्रोच्चार के साथ बांधा जाता है, तो वह नकारात्मक शक्तियों से रक्षा करता है और जीवन में सकारात्मकता का संचार करता है। यही कारण है कि प्राचीन काल में ब्राह्मण अपने यजमानों को और पत्नी अपने पति को भी रक्षा सूत्र बांधती थीं, ताकि ईश्वर की कृपा सदैव बनी रहे। यह परंपरा हमें स्मरण कराती है कि रक्षा केवल शारीरिक नहीं, बल्कि आत्मिक भी होती है, और परिवार का प्रेम ही सबसे बड़ा सुरक्षा कवच है।

इस पावन पर्व पर भगवान से यही प्रार्थना है कि हर भाई-बहन के बीच का यह पवित्र बंधन सदा अटूट रहे, परिवारों में सुख-समृद्धि बनी रहे और यह रक्षा सूत्र सदैव अपनों को बुरी शक्तियों से बचाता रहे। जय श्री कृष्ण, जय राधे।

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